गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
भक्त के लक्षणों को बताते हुये कहे कि जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक “ये तु
धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं”, भक्त के आचरण के सम्बंध में यथोक्तंं
अर्थात् जैसा कि “भक्त के लक्षण 1 से 7 पर्यंत”, का पालन करते हुये मेरी आराधना करता है मैं ऐसे भक्त को अतिशय
प्रिय मानता हूँ ।
इस प्रकार भक्ति-योग नामक बारहवाँ
अध्याय पूर्ण हुआ ।
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