शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

क्षेत्रज्ञ

प्रकृति निर्मित शरीर कर्ता परंतु कर्म प्रेरण क्षमता से रहित होती है । आत्मा का मौलिक स्वरूप / धर्म अकर्ता, असम्बद्ध, स्वत: प्रकाशित, दृष्टा, अद्वैत होता है । अज्ञान के वशीभूत जब आत्मा अनात्मन के साथ सम्बद्ध और कर्ता स्वरूप में प्रगट होने लगती है तो वह क्षेत्रज्ञ कही जाती है ।

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