गुरुवार, 31 मार्च 2016

अहंकार और निरंकार

गुरू द्वारा बताये गये ब्रम्ह के रहस्य को एक व्याख्याकार कहता है कि आत्मा जो कि रूप जीव को आश्रय देती है वह अहंकार बोध के द्वारा उस रूप की प्रकृति से बँधी रहती है जबकि ब्रम्ह जो कि समस्त रूपों का सृजनकर्ता है और समस्त रूप उसके सहारे से ही अपने रूप में स्थिर हैं वह अहंकार भाव से पूर्णतया मुक्त होने के कारण प्रत्येक रूप से अछूता है । 

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