गुरू के उपदेशित पथ के अनुसरण से सत्य को स्वयँ अपने अनुभूति
द्वारा जाने । यह पुस्तक का ज्ञान नहीं है, यह प्रवचन द्वारा संचरित ज्ञान नहीं है, वंश परम्परा द्वारा अंतरित ज्ञान नहीं है ।
सत्य स्वयँ प्रकाशित विषय है जिसे कि मानसिक विकास द्वारा, विकसित संवेदनशीलता द्वारा, विकसित नैसर्गिक अनुभूतियों की ग्रहणक्षमता द्वारा स्वयं की
अनुभूति द्वारा बिना किसी बाह्य शिक्षा के माध्यम से जाने ।
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