सत्य की अपरिवर्तनीय प्रकृति आत्मा ही व्यक्ति के जीवन का आधार
होती है । दार्शनिक कहता है कि ईश्वर है परंतु हम उसे सीधे रूप से नहीं जान सकते
है बल्कि अ-परोक्ष अनुभव से ही जान सकते हैं । परंतु एक संत एक फक़ीर उसे अपनी
आत्मा के अंत:करण में अनुभूति के अनुभव द्वारा सीधे रूप से जानता है । गुरू अपने
शिष्य को सत्य की अनुभूति स्वयं उसके अपने अनुभूति द्वारा करा देना लक्ष्य करते
हैं ।
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