व्याख्याकार
गुरू द्वारा कर्म में अक्षम एवं किसी भी परिवर्तन की सम्भावना से इंकार की
व्याख्या करते हुये बताता है कि मुक्त आत्मा के अवतार पुरुष योगेश्वर श्रीकृष्ण
किसी भी प्रकार के प्रकृतीय मोंह से पूर्णातया परे हैं इसलिये वह किसी कर्म के
कर्ता नहीं हैं । बंधन मोंह के अधीन किये गये कर्मों द्वारा उत्पन्न होता है ।
आत्मा में विक्षेप मोंह से ही सृजित होता है । इसलिये मोंह से मुक्त पुरुष किसी भी
कर्म का कर्ता नहीं होता है और ना ही किसी कर्म द्वारा उसकी आत्मा में कोई विक्षेप
ही पैदा होता है ।
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