गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन से कहे कि पहले कर्म को जानो, पुन: त्रुटिपूर्ण कर्म को जानो फिर
अकर्म को जानो । इन सब से कठिन होगा जानना कि कर्म करने की सही विधि क्या है ।
व्याख्याकार कहता है कि सामान्य मनुष्य सही कर्म और उसे करने की सही कर्म विधि
नहीं अपना पाता है । कुछ तत्कालीन परिस्थितियाँ, कुछ पुरातन मान्यतायें,
कुछ उसके अपना विवेक यह सभी मिलकर मनुष्य को अस्पष्ट स्थिति का सामना कराते हैं ।
ज्ञानी पुरुष इस प्रकार के अस्पष्ट अनिश्चितता का निवारण अपरिवर्तनीय सत्य को आधार
बनाकर करते हैं ।
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