सोमवार, 8 जून 2015

कर्म और अकर्म : चरण 5

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि कर्म करते हुये जब उस कर्म के फल से मानसिक आसक्ति ना रह जाय और ना ही कर्म के निमित्त से कोई मानसिक आसक्ति रह जाय, ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्य भाव में पूर्ण संतुष्ट रहते हुये जो कर्म करता है उसका कर्म पूर्ण रूप से अकर्म की श्रेणी का होता है । ऐसा व्यक्ति किसी कर्म का कर्ता नहीं होता है जबकि वह सदैव कर्म करता रहता है । 

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