शनिवार, 6 जून 2015

कर्म और अकर्म : चरण 3

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो मनुष्य कर्म करने में अकर्म की भावना रखता है तथा अकर्म में कर्म देखता है वह ही ज्ञानी है वह ही योगी है वह ही सभी कार्य सही पद्धति से कर पाता है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन को स्पष्ट करते हुये बताता है कि समस्त कर्मों की कर्ता प्रकृति होती है परंतु बिना आत्मा के सम्मलित हुये कर्म होता नहीं है इसलिये कर्म में आत्मा के सम्मलित होने के प्रति आत्मा का अपेक्षित भाव होता है कि मैं प्रकृति के कार्य को पूर्ण कराने के लिये सम्मलित हूँ परंतु कर्म से मेरा कोई सम्बंध नहीं है । स्मर्णीय है कि गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को शुरू से यही बताते आये हैं कि तुम्हारा सत्य परिचय तुम्हारी आत्मा है ना कि प्रकृति । उपरोक्त कथन के उत्तरार्ध में योगेश्वर ने कहा कि अकर्म में कर्म देखता है अर्थात् जैसे अर्जुन ने कहा कि मैं युद्ध नहीं करूँगा यह कथन कर्म करने के तुल्य ही है इंकार भी कर्म ही है । इसीलिये गुरू ने अर्जुन से कहा कि प्रकृति द्वारा आरोपित कर्म से विमुख होना तुम्हारा धर्मवत् आचरण नहीं है । अर्जुन के मस्तिष्क में व्याप्त प्रकृतीय मोंह को गुरू ने इस अधर्मवत् कृत का कारण होना बताया ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें