बुधवार, 10 जून 2015

कर्म और अकर्म : चरण 7

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति प्रकृति द्वारा उपस्थित की गई प्रत्येक परिस्थिति में संतुष्ट रहता है, जिस व्यक्ति को सांसारिक द्वैतों से सुख अथवा दु:ख की अनुभूति नहीं रह जाती है, जिसे अन्य की उपलब्धियों से द्वेष नहीं रह जाता है, ऐसा व्यक्ति सफलता और असफलता में समभाव में रहता है, वह कार्य करते हुये भी कर्मके बंधन से मुक्त रहता है । व्याख्या : कर्म स्वयँ बन्धनकारी नहीं होता है । यदि कर्म बंधनकारी रहता तो ब्रम्ह और संसार में द्वैत होता । परंतु वास्तविकता यह है कि संसार ब्रम्ह का ही प्रगट स्वरूप है । स्पष्ट है कि कर्म करने की पद्धति बन्धन और मुक्ति का आधार होती है ।

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