इस
रूप सन्सार का सृजन कर्म के लिये ही हुआ है । रूप संसार में प्रतिपल होने वाले
परिवर्तन कर्म द्वारा ही होते है । कर्म की उत्पत्ति आत्मा और प्रकृति के परस्पर
क्रिया द्वारा होती है । कर्मों की कर्ता प्रकृति होती है । परंतु प्रकृति के कर्म
उसी दशा में सम्भव हो सकते हैं जब आत्मा उसमें सम्मलित होवे । प्रकृति आत्मा को
अपने कर्मों में सम्मलित करने के लिये अपने गुणों का सहारा लेती है । कंचिद आत्मा जब प्रकृति के गुणों में
आसक्त हो कार्य सम्पादन को सम्भव बनाती है तो वह बंधन में रहती है । यदि आत्मा
प्रकृति के गुणों में आसक्त हुये बगैर अपना कर्तव्य दायित्व निर्वाह करते हुये
कार्य सम्पादित कराती है तो वह मुक्त रहती है । यही सार गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को अनेको विधि से बताये हैं ।
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