रविवार, 31 मई 2015

कर्म में सक्षमता

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि चार वर्णों की व्यवस्था मैंने ही बनायी है । यद्यपि कि मैं इस व्यवस्था की उत्पत्ति करने वाला हूँ फिरभी मैं किसी कर्म के लिये अक्षम हूँ और मुझ में कोई परिवर्तन सम्भव नहीं है । व्याख्याकार उपरोक्त कथन का विस्तार बताता है कि मनुष्यों में निहित कार्य करने की प्रकृति और कर्म विषेस के सम्पादन में वाँक्षित चतुराई पर आधारित विभाजन चतुर्वर्ण है । यह विभाजन कंचिद जन्म के वंश अथवा समाज के वर्ग पर आधारित नहीं है । कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री के साथ पिता बनने में सक्षम पाया जाता है । इसलिये वर्ण का विभाजन कर्म में मनुष्य द्वारा प्रगट किये गये व्यवहार पर आधारित है । 

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