गुरू द्वारा दैवीय स्वभाव वाले लोगो
के गुण बताये गये जिसका कंचिद ऐसा अर्थ नहीं लिया जाना चाहिये कि कुछ लोग देव
पुरुष और कुछ लोग दानव पुरुष रूप मे होते हैं । यह प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान
गुणों की गणना है । अंतर पडता है उन गुणों के प्रति आस्था द्वारा । जो व्यक्ति
ब्रम्ह ज्ञान को उन्मुख हैं वे अपने अंदर विद्यमान दैवीय गुणों को विकसित करने में
निष्ठावान होते हैं । इसके विपरीत जो लोग पद, प्रतिष्ठा, मान, लक्ष्मी, वैभव के लिये आतुर होते हैं वे
अपने अंदर विद्यमान दैवीय गुणों की उपेक्षा कर असुरी गुणों का भी पोषण करते हैं ।
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