गुरु ने अपने उपदेश में इस संसार
में जिन दो पुरुषों को बताया है, उनमें से एक ब्रम्ह की अपरिवर्तनीय, अविनाशी, अकार्यकारी उच्चतर प्रकृति है जिसे “आत्मा” की संज्ञा दी जाती
है तथा दूसरा विनाशशील, परिवर्तनशील, कार्यकारी निम्नतर प्रकृति है जिससे इस रूप
संसार की समस्त वस्तु एवं जीवशरीरों का निर्माण हुआ है और जिसे “प्रकृति” की
संज्ञा दी जाती है ।
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