गुरू द्वारा असुरीय स्वभाव का
वृतांत विस्तार से बताया जाना सूचक है कि हमें असुरीय स्वभाव को त्याग देना चाहिये
। यह प्रकृति का पूर्व-निर्धारित क्रम नहीं होता है अपितु हमारे अविवेपूर्ण
क्रियाओं का फल होता है । निर्वाण की ओर उन्मुख होना सदैव हमारे वश में होता है ।
पापी से भी पापी व्यक्ति भी जब भगवान की ओर उन्मुख हो जाता है तो वह निश्चय पूर्वक
निर्वाण की स्थिति पर्यंत पहुँचता है ।
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