जीवित प्राणियों और वनस्पतियों में
ब्रम्ह के समाये स्वरूप के विस्तार को और आगे बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण
अर्जुन को बताये कि मैं सबके हृदय में बैठा हुआ हूँ, मुझसे ही उनकी स्मृति और ज्ञान हैं तथा उनका विनाश भी होता है
। वस्तुत: मैं ही वह हूँ, जिसे सब वेदों द्वारा जाना जाता है
। मैं ही वेदांत को बनाने वाला हूँ और मैं ही वेदों का जानने वाला हूँ ।
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