व्याख्याकार
गुरू के द्वारा बताये गये अकर्म की व्याख्या करते हुये बताता है कि हमें अपने अंदर
विद्यमान शाश्वत् शुद्ध आत्मा जो कि प्रकृतीय सँरचनाओं से पूर्णरूप से भिन्न है को
अनुभव करने की आवश्यकता है । प्रकृति प्रतिपल परिवर्तित होती रहती है जबकि इन
परिवर्तनों के गर्भ में कोई अपरिवर्तनीय सत्य नहीं निहित होता है । आत्मा नैसर्गिक रूप
में अकर्ता होती है । अ-परिवर्तनशील आत्मा को किसी कार्य से कोई प्रयोजन नहीं होता है । इस
अपरिवर्तनशील आत्मा को व्यक्ति अपना परिचय बनावे यही अनुशंसा भगवद्गीता में की गई है ।
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