गुरुवार, 16 जुलाई 2015

नि:स्पर्ष की व्याख्या

गुरू द्वारा बताये गये नि:स्पर्ष को स्पष्ट करते हुये व्याख्याकार कहता है कि जब व्यक्ति इस परिवर्तनशील संसार के कर्मों को अपनी व्यक्तिगत आसक्ति और रुचि को त्यागकर, उस कर्म को ब्रम्ह को अर्पित करके करता है, मस्तिष्क की ऐसी दशा मे किया गया उसका कर्म मुक्त कर्म होता है । इसलिये पाप से नि:स्पर्ष रहता है । इस प्रकार कार्य के प्रति मानसिक रुझान, पाप से नि:स्पर्ष रहने के लिये निर्णायक होती है ।   

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