भगवद्गीता
गुरुवार, 23 जुलाई 2015
अज्ञानेन
अज्ञान के अधीन । यह अज्ञान होता है जो मनुष्य को इस विनाशशील संसार के रूपों में सत्य अस्तित्व का भास सृजित करता है । इसी अज्ञान के वशीभूत मनुष्य सत्य ब्रम्ह को विस्मृत कर असत्य प्रकृति के मोंह में आसक्त होता है ।
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