गुरुवार, 30 जुलाई 2015

मुक्ति

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति समस्त रूपों में ब्रम्ह को विद्यमान देखने का अभ्यासी बनता है उसे इस भूलोक में जीवन जीते हुये इस रूप संसार के रूपों के मोंह से मुक्ति मिल जाती है । ब्रम्ह जो कि दोष रहित है वह सभी में विद्यमान है । मस्तिष्क में यह भाव स्थिर से स्पापित हो जाने पर मनुष्य ब्रम्ह में स्थापित हो जाता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें