इस
रूप संसार के प्रत्येक रूप की रचना में एक उभयनिष्ठ एकता, परम् सत्य के अंश की होती है,
जो कि प्रकृति निर्मित प्रत्येक रूपों में विद्यमान होती है । इस परम् सत्य के अंश
का मूल मौलिक परिचय, उसकी सत्य और असत्य के मध्य भेद के
प्रति जागरूकता तथा शांत भाव होता है । भेद आत्मा और प्रकृति में होता है ना कि
आत्मा और शरीर में । प्रकृति वस्तु विस्तार, मिश्रण एवं परवशता पर आधारित होती है
जबकि आत्मा स्वतंत्र अस्तित्व होता है । इस प्रकार यदि प्रत्येक रूप की आत्मा को
उस शरीर का परिचय माना जाय तो गुरू द्वारा बताया गया समभाव स्पष्ट विदित हो जायेगा
।
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