व्याख्याकार
गुरू द्वारा व्यक्त साँख्य और योग के तुलनात्मक अभिव्यक्ति की व्याख्या करते हुये
कहता है कि जहाँ साँख्य में आत्म-चिंतन द्वारा विवेक को जागृत रखते हुये बंधनकारी
कर्मों के त्याग की अपेक्षा बतायी गई है वहीं योग में सही के चुनाव द्वारा कर्मफल
के परित्याग की अपेक्षा बतायी गई है । दोनों का ही प्रभाव एक ही होता है परंतु
क्रियांवन काल में योग का पथ अपेक्षाकृत सुगम साध्य प्रमाणित होता है ।
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