व्याख्याकार
अर्जुन के प्रश्न का विस्तार बताते हुये कहता है कि अर्जुन का प्रश्न
मात्र अर्जुन के परिवेश के व्यक्ति के लिये ही प्रभावी है । जिसे आत्मज्ञान हो गया
है उसे किसी कर्म की वाँक्षना नहीं रह जाती है । इसलिये अर्जुन का प्रश्न मात्र उस
व्यक्ति के लिये उपयोगी है जिसे आत्म-ज्ञान नहीं हुआ है । ऐसे व्यक्ति के लिये
कर्म करना ज्यादा अच्छा पथ है । बिना इच्छा के किया हुआ कर्म बंधनकारी नहीं होता
है और ऐसे ही कर्म के लिये भागवद्गीता में अनुशंसा की गई है ।
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