रविवार, 12 जुलाई 2015

कर्मयोग

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि जो व्यक्ति योग की दशा में कार्य का अभ्यासी होता है, जिसकी आत्मा मोंह से मुक्त होती है, जिसे अपनी आत्मा पर पूर्ण नियंत्रण होता है, जिसने अपनी को पूर्ण वश में किया है, जिसे प्रत्येक रूप में निहित आत्मा में एकरूपता का अनुभव मिलता है, उनका कार्य किसी भी दशा में त्रुटिपूर्ण नहीं होता है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें