व्याख्याकार
कहता है कि ज्ञान का जिज्ञासु जितना ही सीखता है उतना ही विनम्र हो जाता है । जब
हम अंधकार मे मोमबत्ती जलाते हैं तभी हमें अनुभव आता है कि अंधकार कितना गहन है । सच्चाई
यह है कि हम जितना जानते हैं वह हमारे ना जानने की अपेक्षा अति अल्प होता है ।
इसलिये थोडा ज्ञान होने पर व्यक्ति रूढवादी हो जाता है, उससे थोडा अधिक ज्ञान होने पर उसके सामने
अनेकानेक प्रश्न उपस्थित होते हैं, और थोडा अधिक ज्ञान होने पर वह
प्रार्थना करने लगता है । यहाँ तककि ज्ञान का स्तर एक सीमा तक उठने पर यह अनुभव करता है कि हमारा अस्तित्व प्रभु की कृपा से ही है । प्रत्येक धर्म में,
प्रत्येक काल में सभी प्रत्येक विद्वान संत प्रभु के प्रति श्रद्धालु
ही हुये हैं ।
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