सोमवार, 13 जुलाई 2015

अकर्म का स्वरूप

गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया कि जो व्यक्ति स्वयं को किसी अलग अस्तित्व के रूप में अनुभव नहीं करता है बल्कि वह अपने को परम् ब्रम्ह के साथ एकीकृत महसूस करता है, उसका देखना, सुनना, स्पर्ष, सूँघना, स्वादलेना, चलना, सोना, साँस लेना, बोलना, विसर्जन करना, धारण करना, आँखों का खुलना बंद होना, सभी क्रियाँये इस प्रकार सम्पादित होती हैं कि मानो इंद्रियाँ अपने विषयों के साथ परस्पर कर रही होती हैं । 

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