रविवार, 14 फ़रवरी 2016

जीवन ज्योति

ब्रम्ह जो कि इंद्रियों, मस्तिष्क, विवेक के लिये अग्राह्य है का ध्यान कैसे किया जाय के सम्बंध में गुरू की अनुशंसा है कि व्यक्ति को अपनी आत्मा के ध्यान का अभ्यास करना होगा जो कि ब्रम्ह की उच्चतर प्रकृति है, अभेद्य है, सूक्ष्मतम् है, अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने में चमकते हुये सूर्य की ज्योति के समान सक्षम है । गुरू का अभिप्राय है कि सतत् आत्मचेतना ही सतत् ब्रम्ह के ध्यान का व्यवहारिक स्वरूप है ।

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