विगत तीन अंको में गुरू द्वारा बताये गये मृत्यु के समय विचार
के सम्बंध में उपदेश का सार यह है कि व्यक्ति अपने विचारो के द्वारा ही अपना
भविष्य सृजित करता है । किसी भी कर्म का उद्भव विचारों के धरातल से ही होता है ।
इसीलिये गुरू अनुशंसा करते हैं कि मेरे विचारों में संलग्न रहते हुये युद्ध करो ।
ब्रम्ह का सतत् स्मरण करते हुये कर्मों को करो । सतत् ब्रम्ह के ध्यान में संलग्न
रहना ही योग है । वह ब्रम्ह मुझमें है । वासुदेव सर्वस्य । हमें अपने समस्त कर्मों
को ईश्वर को समर्पित करना है जो कि हमारा रक्षक है हमारे अंदर व्याप्त है । यही
सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभ्यास है
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