मौलिक स्वरूप में कर्म का सूत्रपात ब्रम्ह से हुआ है । ब्रम्ह
के कर्म द्वारा ही यह रूप संसार प्रगट हुआ है । इस परिवर्तनशील संसार में कर्म
प्रेरण का दायित्व उसकी अपरिवर्तनीय प्रकृति आत्मा में निहित होता है । इस संसार
के समस्त कर्मों की कर्ता उसकी परिवर्तनशील प्रकृति होती है । इन्ही दोनो की
परस्पर क्रिया ही इस संसार के समस्त कर्म है, फलत: गति हैं, फलत: परिवर्तन है ।
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