गुरू साधना अवधि में सम्भावित समस्त विघ्नों को नियंत्रित करने
का उपदेश किये हैं । भौतिक बाधाओं से रक्षा के लिये शरीर के नौ द्वारों का
नियंत्रण । स्मृति से विघ्न की सम्भावना के निवारण के लिये मस्तिष्क का धारणा में
केंद्रित रखने का परामर्ष । जीवन शक्ति प्रकृतीय मोंह को ना उन्मुख होवे इसकी
रक्षा के लिये उसे मस्तक में स्थिर रखने का परामर्ष किये हैं ।
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