ब्रम्ह की अ-परिवर्तनीय प्रकृत ही इस रूप संसार की वैयक्तिक
ईश्वर है । इसे ही हिरण्यगर्भ कहा गया है । इसे ही संसार के लोग पूजते हैं । यह ही
समस्त पूजने वालों की आराध्य है । मनुष्य के शरीर में यही आत्मा है । यही समस्त
रूपों का आधार है । यह प्रत्येक परिवर्तनीय को बेधने में सक्षम है जबकि इसे कोई
बेध नहीं सकता है ।
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