कर्म की उत्पत्ति परिवर्तनशील प्रकृत और अ-परिवर्तनीय आत्मा के
मध्य परस्पर क्रिया द्वारा होती है । गुरू ने कर्मों की कर्ता परिवर्तनशील प्रकृति
को बताया है । अ-परिवर्तनीय प्रकृति यद्यपि कि कर्मों की अकर्ता होती है फिरभी कर्म
की उत्पत्ति उसके सम्मलित होने पर ही होती है । अ-परिवर्तनीय प्रकृति से आहुति
अपेक्षित होती है । आहुति होने वाला ब्रम्ह है ।
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