इस रूप संसार में विषय आत्मा वस्तु प्रकृति के मध्य परस्पर
क्रिया और प्रतिक्रिया ही इस रूप संसार की गतिविधि होती है । परिवर्तनशील प्रकृति
अपने गुणों के द्वारा अपरिवर्तनशील विषय आत्मा को मोहित करती है । विषय आत्मा का
वस्तु प्रकृति को अवलम्ब देना नैसर्गिक धर्म होता है । इन्ही के परस्पर द्वारा इस
रूप संसार की गति सृजित होती है ।
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