गुरू का उपदेश है कि सतत् अवतार पुरूष के ध्यान के अभ्यास
द्वारा व्यक्ति ब्रम्ह के साथ सीधे सम्पर्क में हो जाता है । यह अभ्यास इतना
विकसित करने की गुरू की अनुशंसा है कि अवतार पुरुष का ध्यान व्यक्ति का आम स्वभाव
ही बन जाय । ऐसा अभ्यास होने की दशा में ही व्यक्ति मृत्यु का समय आने पर इस शरीर
को त्यागने के समय ब्रम्ह का ध्यान कर सकेगा ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें