मनुष्य की सामान्य प्रवृत्ति प्रकृतीय मोंह में आसक्ति की होती
है । यह उसके पुनर्जन्म का अधार होता है । इसके विपरीत यदि व्यक्ति विषेस
प्रयत्नों के द्वारा अपने को ब्रम्ह के साथ युक्त रखने का अभ्यास अपनी आम क्रिया
पद्धति बना लेता है तो फलत: उसकी प्रकृतीय मोंह की दशा क्षीण हो जाती है और वह
ब्रम्ह के प्रतिनिधि के स्वरूप में पर्णित हो जावेगा । इस दशा की चरम स्थिति होगी
श्रीपद में विलय । ऐसे व्यक्ति की आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होगा ।
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