विचाराधीन चाहे परिवर्तनशील प्रकृति होवे अथवा अपरिवर्तनीय प्रकृति
होवे अथवा दोनों के परस्पर से उत्पन्न होने वाला कर्म होवे, तीनो ही एकल ब्रम्ह की ही क्षवि को निरूपित
करने वाले होते हैं । ब्रम्ह ही आहुति भी है, आहुति होने वाली वस्तु भी ब्रम्ह ही है, आहुति ग्रहण करने वाली अग्नि भी ब्रम्ह है, ब्रम्ह को पाने के लक्ष्य से ही आहुति दी
भी जाती है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें