ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि वर्णमाला का मैं प्रथम अक्षर हूँ, मिश्रित में मैं द्वंद हूँ, मैं अक्षय समय हूँ और सृजनकर्ता में मैं ब्रम्हा हूँ जिसका मुख
प्रत्येक दिशा मैं है ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
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