ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि पवित्र करने वालों में मैं “वायु” हूँ, वन में विचरण करने वाले शस्त्रधारियों में मैं “राम” हूँ, मछलियों में मैं “शार्क” हूँ, बहती हुई नदिंयों में मैं “गंगा” हूँ ।
एक
संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
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