शनिवार, 3 दिसंबर 2016

रूप विस्तार : चरण 12

ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि समस्त सृजित हुये रूपों का मैं आदि, मध्य और अवसान हूँ, हे अर्जुन समस्त ज्ञात विज्ञानों में “आत्म विज्ञान” (spiritual scince of self) हूँ, तर्क द्वारा सत्य को जानने के प्रयत्नों में मैं अंतिम निष्कर्श के रूप में आहरित होने वाला सत्य हूँ । 

एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।  

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