गुरू द्वारा इस रूप विस्तार के
सम्बंध में बताये गये उपदेश का साराँश यह है कि इस रूप संसार का प्रत्येक रूप
ब्रम्ह की महिमा द्वारा ही सृजित हुआ है,
उनकी कृपा द्वारा ही अपने रूप में स्थिर है, परंतु जो भी रूप अधिक सुंदर और वैभवयुक्त प्रगट होते हैं वह
ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्त करने वाले होते हैं । इस रूप संसार के दृष्य पटल
पर जो भी कीर्तिमानकृत, जो भी महानतम बलिदान, जो भी प्रखर बुद्धिमत्ता के कर्म सम्भव
होते हैं वह समस्त ब्रम्ह को अधिक सक्षमता से व्यक्तकरने वाले प्रमाणित होते हैं ।
जो भी महाकाव्य, जो भी वीरगाथा मनुष्य के सीमित
मस्तिष्क के लिये अस्पष्ट अथवा अपरिभाष्य प्रतीत होते हैं वह सभी ब्रम्ह के मात्र
अंशमात्र वैभव द्वारा सम्भव हो जाते हैं ।
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