शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

रूप विस्तार : चरण 20

ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट करने वाले स्वरूप की गणना को उपरोक्तानुसार कराने के उपरांत गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि मेरे वैभव से सृजित हुये रूपों की गणना का कहीं अंत नहीं है हे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले अर्जुन जो कुछ भी मैंने बताया है वह मेरी अन्तविहीन वैभव का मात्र प्रतीक अन्श है । 
एक संदेश
अपने चेतन स्वरूप के प्रति सचेत होवें । चेतन स्वरूप जो कि सदैव अपने स्वरूप में स्थिर रहता है । आप चाहे जागृत दशा में हैं अथवा स्वप्न दशा में है अथवा गहरी नीद की दशा में हैं चेतन स्वरूप सदैव अपने चेतन स्वरूप में ही रहता है । इस चेतन स्वरूप के प्रति निरंतर सचेत रहना आपकी पूर्णता है ।  

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