ब्रम्ह को अधिक सक्षमतासे प्रगट
करने वाले स्वरूप की गणना को और आगे बताते हुये गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को
बताये कि प्रशंसा गायन के गीतों में बृहतसम हूँ, ध्वनि में निरंतर नियमित गति सृजित करने वाली कविताओं में मैं
गायत्री मंत्र हूँ, माह/महीनों में मृगशिरा हूँ, ऋतुओं में मैं फूलों से भरी बसंत ऋतु हूँ ।
एक संदेश
इस रूप संसार का स्वरूप
विषय चेतना का फल होता है । इस संसार के प्रपंचो का विस्तार मस्तिष्क की चेतना का
फल होता है । इन समस्त अविद्या विस्तार से मुक्ति आत्मबोध का फल होता है । ज्ञान
का फल मोक्ष होता है ।
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