गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अब तक जितना कुछ साँख्य एवँ योग के विषय में
बताया उससे मानो अर्जुन एक का ज्ञान दूसरे में मिला बिलकुल मतिभ्रमित सा हो गया वह
अ-क्रमबद्ध
रूप से कहने लगा कि यदि बुद्धियोग ज्यादा उत्तम है तो आप मुझे कर्म का परामर्ष
क्यों दे रहे हैं । यदि साँख्य ज्ञान प्राप्ति का ज्यादा अच्छा पथ है तो योग का
क्या औचित्य हैं ।
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