व्याख्याकार
कहता है कि प्रकृतीय मोंह से मुक्त आत्मा कर्म में संलग्न होती है परंतु अपने किसी
स्वार्थ जनित
इच्छा की पूर्ति के लिये नहीं, प्रकृति के किसी गुण के प्रभाव से नहीं
अथवा अविद्या के प्रभाव से नहीं अपितु जैसे ईश्वर कार्य करता है बिना कर्म में
लिप्त हुये कार्य करता है । जिसको आत्मा का बोध हो गया है, जिसका अहंकार क्षीण हो गया है वह अपने
अंत:करण में विद्यमान परम् सत्य की प्रेरणा से कार्य करता है । स्वार्थ पूर्ति की
इच्छा से मुक्ति, व्यक्तिगत स्वार्थ के भ्रम से मुक्ति ही सच्चा निष्कर्म होता
है ।
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