गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को इच्छाओं के सम्बंध में दिये गये उपदेशों को व्याख्याकार
उपनिषदों के संदर्भ से स्पष्ट करते हुये कहता है कि जिस मनुष्य का मस्तिष्क
इच्छाओं की पूर्ति के लिये चेष्टारत है वह अशुद्ध है । जिस मनुष्य का मस्तिष्क
इच्छाओं की लिप्सा से विरक्त है वह शुद्ध है ।
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