सही
के चुनाव द्वारा, ईश्वर के प्रति समर्पण से युक्त, अहंकार का त्याग कर के,
इच्छा का पूर्ण मर्दन करके मनुष्य प्रकृतीय मोंह से पूर्ण मुक्ति पा सकता है ।
मुक्ति की दशा इस जीवन के रह्ते हुये ब्रम्ह का अनुभव, ब्रम्ह की शांति देने वाली होती है ।
जीवन के कलह, त्रास, अशांति सभी लुप्त हो जावेंगे ऐसा संत
कार्य तो सभी करेगा परंतु फल के लिये नहीं अपितु ब्रम्ह की सेवा
के लिये ।
इस
प्रकार भागवद्गीता का बुद्धियोग नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें