बुद्धियोग
की दूसरी
बाधा का विस्तार बताते हुये गुरू योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते
हैं कि जब इंद्रियाँ मस्तिष्क को अपनी वासनाओं में आकर्षित करने में सफल हो जाती
हैं तो मस्तिष्क वासना के व्यभिचार में लिप्त हो उनकी इच्छा जनित कर लेता है । पुन:
इच्छा से क्रोध जनित होता है । पुन: क्रोध स्मृति क्षय में पर्णित होता है । स्मरण
का क्षय विवेक के नाश में पर्णित होता है । विवेक का नाश होना पूर्ण पतन की स्थित होती
है ।
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