गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बुद्धियोग में स्थापित संत के लक्षण बताये,
पुन: बताया कि इंद्रियाँ किस प्रकार जिज्ञासु अथवा सिद्ध संत को पूर्ण पतन की
स्थिति पर्यंत पहुँचाने में समर्थ प्रमाणित होती हैं । इन
इंद्रियों को वश में करने के लिये गुरू वास्तविक रहस्य बताते है । गुरू बताते हैं कि
इंद्रियों को हठात् उनकी वासना वस्तु से हटाना या दूर करना,
अथवा उन विषय वस्तुओं से घृणा करना सहायक नहीं होगा । घृणा भी उतनी ही घातक होती
है जितना कि प्यार । इस सम्भावित बाधा के निवारण के लिये मनुष्य को अपने अंत:करण से उन
वासना वस्तुओं से विमुख होना वास्तविक निदान होता है । जीवन रूपी रथ से इंद्री
रूपी घोडों को हटाया नहीं जा सकता है । मस्तिष्क की लगाम द्वारा इन घोडों को
नियंत्रित करना लक्ष्य करना निदान प्रमाणित होता है । मस्तिष्क का सफलता पूर्वक
प्रयोग बुद्धियोग की स्थापना का मूल रहस्य है ।
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