मनुष्य
की आंतरिक शक्ति के प्रति सजग विवेक, प्रकृति द्वारा आदेशित कर्मों के सम्पादन
के लिये प्रचुर आंतरिक शक्ति, मुक्ति की स्वतंत्रता,
परम् सत्य को सतत्
समर्पण यह
स्थितियाँ जो प्रत्येक धर्म के संतों में उभयनिष्ठ रूप से पायी जाती हैं । इसलिये यह निष्कर्श
निकलता है कि प्रत्येक धर्म परम् सत्य को कुछ उभयनिष्ठ मान्यताओं के अधीन मानता है
। ऐसे संत मानव समाज के लिये उदाहरण होते हैं । कंचिद स्वार्थ के दायरे में बँधा
मानव यदि जागृत होकर प्रगति का पथ अपनावे तो सम्पूर्ण मानवता स्वार्थ के संकीर्ण
दायरे से प्रगति कर एक उच्च स्तरीय जीवन को प्राप्त कर सकती है ।
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