गुरू
योगेश्वर श्रीकृष्ण अर्जुन को बताये कि यदि मनुष्य अपनी बाह्य क्रियाओं को
नियंत्रित करता है परंतु अपनी इच्छाओं को नहीं नियंत्रित करता है जोकि बाह्य
क्रियाओं की प्रेरक होती हैं तो ऐसी दशा में उसका इंद्रियों को नियंत्रित करने का
प्रयत्न सार्थक नहीं होगा । हे अर्जुन इस दृष्य संसार का समस्त रूप भोग और
स्वामित्व के लिये नहीं होता है । इसलिये हे अर्जुन यदि खोई हुयी मानसिक शांति को
फिर से पाना है, यदि हेरा-फेरी के दुष्कर्म से मुक्त होना है,
यदि छाये हुये अज्ञान का नाश करना है तो संसार के समस्त रूपों को परम् ब्रम्ह के
प्रगट रूप की मर्यादा से ग्रहण करना होगा, प्रत्येक कर्म को परम् ब्रम्ह की सेवा
के रूप में करना होगा । यही सच्चा निष्कर्म होगा ।
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